
गर्मियों के मौसम में बुंदेलखंड की दोपहर किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं होती। सूरज सिर पर अंगारे बरसा रहा होता है, मिट्टी से भाप उठती है और खेत बंजर पड़े दिखाई देते हैं। ऐसे ही एक तपते दिन, किसान रामलाल अपने खेत के किनारे खड़ा आसमान की ओर देख रहा था। उसकी आँखों में उम्मीद थी कि बादल आएँगे, बरसेंगे और उसकी फसलें बच जाएँगी। लेकिन यह उम्मीद अब सालों से अधूरी ही रह जाती है।
गाँव में चारों तरफ नज़र डालो तो कई तालाब सूखे पड़े हैं, जिनमें कभी बच्चों की किलकारियाँ और मछलियों की छलक सुनाई देती थी। कुएँ और हैंडपंप प्यासे हैं। भूजल इतना नीचे चला गया है कि कूप खोदने पर भी पानी नहीं मिलता।
रामलाल की यह कहानी सिर्फ एक किसान की नहीं है, बल्कि पूरे बुंदेलखंड की सच्चाई है। और यही वजह है कि आज लघु सिंचाई योजनाएँ और विशेषकर तालाब खुदाई व जीर्णोद्धार इस क्षेत्र के लिए जीवनदायिनी पहल बन गई हैं।
लघु सिंचाई: छोटी योजना, बड़ा असर
भारत की पहचान एक कृषि प्रधान देश के रूप में रही है। यहाँ करोड़ों लोग खेती पर निर्भर हैं। खेती के लिए सबसे ज़रूरी है पानी। लेकिन जब बड़े बाँध या नहर हर खेत तक पानी नहीं पहुँचा पाते, तब काम आता है लघु सिंचाई (Minor Irrigation)।
लघु सिंचाई का मतलब है – छोटे पैमाने पर बनाए गए जलस्रोत, जैसे:
- तालाब
- कुएँ
- चेक डैम
- ट्यूबवेल
- नलकूप
- वर्षा जल संचयन संरचनाएँ
इनका फायदा यह है कि इन्हें गाँव के स्तर पर ही बनाया और संभाला जा सकता है। किसानों को पानी पास में ही मिल जाता है, और खेती के साथ-साथ पशुओं और घरेलू ज़रूरतों के लिए भी सहारा मिल जाता है।
👉 यही वजह है कि सरकार समय-समय पर लघु सिंचाई गणना (Minor Irrigation Census) कराती है, ताकि यह पता चल सके कि देश में कितने छोटे जलस्रोत हैं और उनकी स्थिति कैसी है।

गणना की ज़रूरत – क्यों है अहम?
कल्पना कीजिए – अगर डॉक्टर बिना जाँच किए दवा लिख दे तो क्या होगा? शायद बीमारी और बढ़ जाएगी।
ठीक उसी तरह, अगर सरकार को यह ही न पता हो कि गाँवों में कितने तालाब हैं, कितने काम कर रहे हैं, कितने टूट चुके हैं, तो वह योजना कैसे बनाएगी?
यही कारण है कि हर पाँच साल में लघु सिंचाई गणना की जाती है।
इस गणना के ज़रिए:
- कुओं, तालाबों और ट्यूबवेलों की गिनती होती है।
- उनकी हालत जानी जाती है।
- यह पता चलता है कि किसान कितनी ज़मीन की सिंचाई कर पा रहे हैं।
- और यह भी समझ आता है कि कौन-से जलस्रोत बेकार पड़े हैं और क्यों।
7वीं लघु सिंचाई गणना – एक नया अध्याय
अब तक की सभी गणनाएँ कागज़-कलम पर होती थीं। लेकिन 2023-24 की 7वीं लघु सिंचाई गणना पूरी तरह डिजिटल हो गई है।
अब हर गणनाकर्मी मोबाइल ऐप या वेब पोर्टल के ज़रिए डेटा दर्ज करता है।
- 📱 मोबाइल ऐप – गाँव-गाँव जाकर फील्ड में तुरंत डेटा भरना।
- 💻 वेब एप्लिकेशन – सभी जानकारी सीधे ऑनलाइन पहुँचाना।
- 📊 डैशबोर्ड – एक क्लिक में यह देखना कि कहाँ कितने तालाब, कुएँ या ट्यूबवेल हैं।
इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ी है, बल्कि समय भी बचता है। सबसे बड़ी बात – अब गलत या अपूर्ण डेटा की गुंजाइश बहुत कम रह गई है।
बुंदेलखंड – जल संकट की धरती
उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के बीच फैला बुंदेलखंड क्षेत्र हमेशा से पानी की कमी झेलता आया है। यहाँ की भौगोलिक स्थिति कुछ ऐसी है कि:

- बरसात कम होती है।
- ज़मीन पथरीली है, पानी सोख नहीं पाती।
- भूजल तेजी से नीचे चला जाता है।
कई गाँवों में तो हाल यह है कि लोग दिनभर एक-दो घड़े पानी के लिए भटकते हैं। गर्मियों में तालाब सूख जाते हैं और कुएँ प्यासे रह जाते हैं।
लेकिन बुंदेलखंड की पहचान सिर्फ संकट से नहीं है। यह क्षेत्र अपनी जल-संरक्षण परंपरा के लिए भी जाना जाता है। यहाँ पुराने ज़माने में हर गाँव में तालाब और बावड़ियाँ हुआ करती थीं। लोग सामूहिक रूप से इन्हें बनाते और सँभालते थे।
अब वही परंपरा लघु सिंचाई विभाग और सरकारी योजनाओं के ज़रिए फिर से ज़िंदा की जा रही है।
तालाब का महत्व – गाँव की जीवन रेखा
गाँव के बीचों-बीच बना तालाब सिर्फ पानी का गड्ढा नहीं होता। यह गाँव की जीवन रेखा होता है।
- खेतों की सिंचाई
- पशुओं की प्यास बुझाना
- घरेलू काम
- मछली पालन
- भूजल रिचार्ज
तालाब भरते ही गाँव में खुशहाली लौट आती है। किसान की फसल बच जाती है, बच्चे तालाब किनारे खेलते हैं और पक्षी चहचहाते हैं।
इसलिए जब लघु सिंचाई विभाग तालाब खुदाई और जीर्णोद्धार करता है, तो वह केवल पानी नहीं लाता, बल्कि पूरे गाँव में जीवन की लहरें वापस लाता है।
छोटी सी कहानी – तालाब ने कैसे बदली ज़िंदगी
Jhansi जिले के एक छोटे से गाँव में एक तालाब था जो बरसों से सूखा पड़ा था। किनारे टूट चुके थे, बीच में घास और झाड़ियाँ उग आई थीं। कोई उस पर ध्यान नहीं देता था।
फिर गाँव पंचायत ने लघु सिंचाई विभाग की मदद से उसका जीर्णोद्धार कराया। JCB मशीनें आईं, तालाब गहरा और चौड़ा किया गया। बरसात आई तो तालाब भर गया।
आज वही तालाब पूरे गाँव के लिए जीवन बन चुका है।
- खेतों में सिंचाई हो रही है।
- मछली पालन से युवाओं की कमाई बढ़ी है।
- भूजल ऊपर आया है, इसलिए अब हैंडपंप भी चलने लगे हैं।
गाँव के बुज़ुर्ग कहते हैं – “तालाब वापस आया तो गाँव भी फिर से जी उठा।”
तालाब खुदाई की कहानी – एक सामूहिक प्रयास
गाँव के लोग कहते हैं – “तालाब सिर्फ मिट्टी का गड्ढा नहीं, यह गाँव की पहचान है।”
लेकिन समय और लापरवाही से कई तालाब सूख गए, उनमें मिट्टी भर गई और वे बेकार हो गए।
यही वह पल था जब लघु सिंचाई विभाग और ग्राम पंचायतें एकजुट होकर तालाब खुदाई और जीर्णोद्धार की पहल करने लगीं।
तालाब खुदाई एक कहानी की तरह है, जो कदम-दर-कदम आगे बढ़ती है:
1. स्थान का चयन – सही जगह पर तालाब
सबसे पहले तय होता है कि तालाब कहाँ बनेगा।
- गाँव के बीच या खेतों के पास
- नीची ज़मीन, जहाँ पानी स्वाभाविक रूप से रुक सके
- ऐसी जगह जहाँ आसपास ज़्यादा से ज़्यादा खेतों को फायदा हो
👉 सही जगह पर तालाब बनाना आधी सफलता है।
2. योजना और डिज़ाइन
तालाब की लंबाई, चौड़ाई और गहराई कैसी होगी – यह इंजीनियर और विशेषज्ञ मिलकर तय करते हैं।
- कुछ तालाब आयताकार बनाए जाते हैं।
- कुछ गोल या अंडाकार होते हैं।
- किनारों की ढलान इस तरह रखी जाती है कि पानी आसानी से अंदर आए लेकिन बाहर न निकले।
3. खुदाई का काम
यह सबसे महत्वपूर्ण चरण है।
- पहले के ज़माने में लोग फावड़ा और टोकरी लेकर तालाब खुदाई करते थे। पूरा गाँव मिलकर यह काम करता था।
- अब JCB मशीनें और ट्रैक्टर काम आसान बना देते हैं।
- मिट्टी को खेतों में डाल दिया जाता है, जिससे खेत की उर्वरता भी बढ़ती है।
कभी-कभी लोग कहते हैं कि तालाब खुदाई एक मेहनत भरा काम है, लेकिन जब पहली बरसात में पानी भरता है तो सारी मेहनत सफल लगती है।
4. किनारों की मजबूती
खुदाई के बाद तालाब के किनारों को मजबूत करना ज़रूरी है।
- कहीं-कहीं पक्की दीवार बनाई जाती है।
- कहीं पत्थरों की परत बिछाई जाती है।
- और कहीं घास लगाई जाती है, ताकि मिट्टी बहकर तालाब में न गिरे।
5. पानी का उपयोग और रखरखाव
तालाब भर जाने के बाद असली काम शुरू होता है।
- किसान खेतों में पानी ले जाते हैं।
- गाँव वाले मछली पालन शुरू करते हैं।
- बच्चे तालाब में नहाते हैं और पशु पानी पीते हैं।
लेकिन अगर तालाब की सफाई और रखरखाव न हो तो वह फिर से बेकार हो सकता है। इसलिए ग्राम पंचायत की ज़िम्मेदारी है कि समय-समय पर इसकी सफाई और मरम्मत कराती रहे।
तालाब खुदाई से होने वाले लाभ
तालाब खुदाई का असर सिर्फ खेत तक सीमित नहीं रहता। यह पूरे गाँव की ज़िंदगी बदल देता है।
1. सिंचाई में सुधार
बरसात खत्म होने के बाद भी किसान अपनी फसलों को पानी दे पाते हैं। फसलें सूखती नहीं, जिससे उत्पादन बढ़ता है।
2. भूजल रिचार्ज
तालाब से आसपास की ज़मीन में पानी रिसकर नीचे जाता है। इससे कुएँ और नलकूप भी चलने लगते हैं।
3. मछली पालन
तालाब में मछलियाँ पाली जाती हैं, जिससे गाँव के युवाओं को रोज़गार मिलता है।
4. पर्यावरण लाभ
तालाब के किनारे हरियाली फैलती है। पक्षी आते हैं, पशुओं को पानी मिलता है।
5. सामाजिक जुड़ाव
तालाब गाँव का मिलन स्थल बन जाता है। लोग वहाँ बैठते हैं, त्योहार मनाते हैं और सामूहिक काम करते हैं।
सरकारी योजनाएँ – किसानों का सहारा
तालाब खुदाई और जीर्णोद्धार में सरकार कई योजनाओं के ज़रिए मदद करती है।
🔹 प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY)
इस योजना का नारा है – “हर खेत को पानी”।
इसके तहत किसानों को सिंचाई संरचनाएँ बनाने और सुधारने के लिए अनुदान मिलता है।
🔹 जलशक्ति अभियान
यह अभियान पानी बचाने और वर्षा जल संचयन पर ज़ोर देता है।
गाँव-गाँव जाकर लोगों को जागरूक किया जाता है।
🔹 मनरेगा (MNREGA)
ग्रामीण मज़दूरों को काम दिलाने के साथ-साथ तालाब खुदाई का काम भी कराया जाता है।
यानी एक तीर से दो निशाने – रोजगार भी और जल संरक्षण भी।
एक प्रेरक उदाहरण
Block Gursarai Dist Jhansi के एक गाँव में मनरेगा के तहत तालाब खुदाई हुई। पहले यह गाँव पूरी तरह बारिश पर निर्भर था। फसलें बार-बार सूख जाती थीं और किसान कर्ज़ में डूबे रहते थे।
लेकिन तालाब बनने के बाद हालात बदल गए।
- गेहूँ और चने की फसल बच गई।
- किसान अब सब्ज़ियाँ भी उगाने लगे।
- गाँव में मछली पालन शुरू हुआ, जिससे युवाओं की आमदनी बढ़ी।
गाँव के प्रधान ने मुस्कराकर कहा –
“तालाब ने हमें फिर से जीना सिखाया है।”
तकनीकी बातें, सरल भाषा में
किसान रामलाल को जब लघु सिंचाई विभाग का सर्वेयर गाँव में आया तो उसने कई शब्द बोले –
- GCA
- CCA
- IPC
- IPU
रामलाल और बाकी किसान हैरान थे – “ये सब आखिर है क्या?”
आइए, इन्हें सरल भाषा और उदाहरणों से समझते हैं।
1. GCA – Gross Command Area (संपूर्ण आदेशित क्षेत्र)
👉 मतलब: वह कुल जमीन जिस पर कोई सिंचाई योजना असर डाल सकती है।
उदाहरण:
अगर किसी तालाब से 100 हेक्टेयर खेतों तक पानी पहुँच सकता है, तो यही उसका GCA है।
यह ज़रूरी नहीं कि हर खेत तक पानी हमेशा पहुँचे, लेकिन तालाब की क्षमता इतनी है कि वह 100 हेक्टेयर को कवर कर सकता है।
2. CCA – Cultivable Command Area (कृषियोग्य आदेशित क्षेत्र)
👉 मतलब: GCA में से केवल वह हिस्सा जो खेती योग्य है।
उदाहरण:
अगर 100 हेक्टेयर के GCA में से 20 हेक्टेयर पत्थरीला या बंजर है, तो बाकी 80 हेक्टेयर CCA कहलाएगा।
3. IPC – Irrigation Potential Created (निर्मित सिंचाई क्षमता)
👉 मतलब: कितने खेतों तक पानी पहुँचाने की क्षमता बनाई गई है।
उदाहरण:
तालाब खुदाई करके और नहर बनाकर अगर 60 हेक्टेयर जमीन तक पानी पहुँच सकता है, तो यही IPC है।
4. IPU – Irrigation Potential Utilized (उपयोग की गई सिंचाई क्षमता)
👉 मतलब: हकीकत में कितनी जमीन की सिंचाई हो रही है।
उदाहरण:
अगर 60 हेक्टेयर IPC है, लेकिन सिर्फ 45 हेक्टेयर तक ही पानी पहुँच पाया, तो वही IPU है।
IPC और IPU का अंतर – असली कहानी
कई बार योजनाएँ बनती हैं, तालाब बनते हैं, लेकिन उनका उपयोग पूरा नहीं हो पाता।
- कभी नहरें टूट जाती हैं।
- कभी पम्प खराब हो जाता है।
- कभी किसान तालाब से जुड़ते ही नहीं।
इसलिए IPC (क्षमता) और IPU (उपयोग) में फर्क रह जाता है।
👉 यही अंतर बताता है कि गणना क्यों ज़रूरी है – ताकि सरकार समझ सके कि योजनाएँ सिर्फ कागज़ पर सफल हैं या असल में भी।
बुंदेलखंड की चुनौतियाँ
अब बात करें उस धरती की, जो सबसे ज़्यादा प्रभावित है – बुंदेलखंड।
1. बारिश पर निर्भरता
यहाँ की खेती लगभग पूरी तरह बारिश पर निर्भर है। अगर बारिश नहीं हुई, तो फसलें सूख जाती हैं।
2. भूजल का गिरता स्तर
नलकूप और बोरवेल गहरे होते जा रहे हैं, लेकिन पानी फिर भी नहीं मिल रहा।
3. पथरीली ज़मीन
यहाँ की मिट्टी पानी रोककर रखने में सक्षम नहीं है। बारिश का पानी जल्दी बह जाता है।
4. पलायन
पानी और खेती की समस्या के कारण लोग रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
5. पुराने तालाबों की उपेक्षा
गाँवों में जो तालाब और बावड़ियाँ कभी जीवन का सहारा थे, आज वे कचरे और झाड़ियों से भर गए हैं।
किसानों पर असर – आँकड़ों से आगे की कहानी
सरकारी रिपोर्टें तो आँकड़े दिखाती हैं, लेकिन असली कहानी किसान की ज़ुबानी समझी जा सकती है।
रामलाल कहता है –
“जब तालाब सूखते हैं, तो हम भी सूख जाते हैं।”
आर्थिक असर
- फसलें खराब होने से किसान कर्ज़ में डूब जाता है।
- उसे अपनी ज़मीन बेचनी पड़ती है या शहरों में मज़दूरी करनी पड़ती है।
सामाजिक असर
- गाँव खाली होने लगते हैं।
- परिवार बिखर जाते हैं।
- महिलाओं और बच्चों को दूर-दूर से पानी लाना पड़ता है।
पर्यावरणीय असर
- तालाब और जलस्रोत सूखने से भूजल नीचे चला जाता है।
- हरियाली घटती है, तापमान बढ़ता है।
लघु सिंचाई गणना – उम्मीद की किरण
यहीं पर लघु सिंचाई गणना एक उम्मीद की तरह सामने आती है।
- यह बताती है कि कितने तालाब हैं और कितने जीर्णोद्धार की ज़रूरत में हैं।
- यह समझाती है कि कौन-सी योजनाएँ असली जमीन पर काम कर रही हैं और कौन-सी सिर्फ कागज़ों में।
- यह सरकार को यह संकेत देती है कि कहाँ अधिक निवेश करना चाहिए।
👉 यानी गणना सिर्फ गिनती नहीं है, बल्कि भविष्य की योजना बनाने का आईना है।
तालाब – सिर्फ पानी नहीं, पूरा जीवन
रामलाल ने जब अपने गाँव में नया तालाब बनते देखा, तो उसके चेहरे पर उम्मीद लौट आई।
पहली ही बरसात में पानी जब छलक कर किनारों तक भर गया, तो गाँव के बच्चे खुशी से कूद पड़े।
किसान कहने लगे – “अब खेत सूखेंगे नहीं, अब घर में रोटी जलेगी नहीं।”
तालाब वास्तव में सिर्फ पानी का गड्ढा नहीं होता, यह पूरे गाँव के लिए जीवन का केंद्र होता है।
आर्थिक फायदे
1. सिंचाई से बढ़ी फसल उत्पादन
तालाब भरने के बाद किसान सिर्फ खरीफ (बरसाती) फसल पर निर्भर नहीं रहते।
अब वे रबी (सर्दी) और ज़ायद (गर्मी) फसलें भी उगा सकते हैं।
- पहले जहाँ एक बीघे में केवल बाजरा या ज्वार बोया जाता था, अब गेहूँ, चना और सब्ज़ियाँ भी उग रही हैं।
- उत्पादन दुगना–तिगुना हो गया।
👉 इसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ा।
2. मछली पालन
तालाब का एक कोना मछली पालन के लिए इस्तेमाल होता है।
गाँव के युवाओं को रोज़गार मिलता है और साल भर अच्छी कमाई हो जाती है।
कभी-कभी तो तालाब की मछलियाँ पास के कस्बों तक बिकने जाती हैं।

3. मिट्टी की उर्वरता
तालाब खुदाई के दौरान निकली मिट्टी खेतों में डाल दी जाती है।
इससे खेत की ज़मीन समतल हो जाती है और पानी ठहरने लगता है।
मिट्टी में नमी बढ़ने से पैदावार बेहतर होती है।

4. भूजल रिचार्ज
तालाब का पानी धीरे-धीरे ज़मीन में रिसता है और भूजल को recharge करता है।
नतीजा यह कि कुएँ, हैंडपम्प और बोरवेल साल भर चलने लगते हैं।

सामाजिक फायदे
1. गाँव का मिलन स्थल
तालाब सिर्फ सिंचाई के काम नहीं आता, यह गाँव का सामाजिक केंद्र भी बन जाता है।
लोग वहाँ बैठकर बातें करते हैं, त्योहार मनाते हैं और सामूहिक बैठकें होती हैं।

2. महिलाओं और बच्चों को राहत
जहाँ तालाब होते हैं, वहाँ महिलाओं को मीलों दूर पानी ढोने नहीं जाना पड़ता।
बच्चे आसानी से नहाते–धोते हैं और साफ पानी मिलने से बीमारियाँ भी कम होती हैं।

3. पलायन में कमी

जब गाँव में पानी और रोज़गार मिलता है, तो लोग शहर भागने की बजाय अपने गाँव में रहना पसंद करते हैं।
4. सामाजिक एकजुटता
तालाब बनाने और उसकी देखरेख में पूरा गाँव साथ आता है।
यह काम सिर्फ पानी नहीं देता, बल्कि गाँव वालों में भाईचारे और सहयोग की भावना भी बढ़ाता है।
केस स्टडी – बुंदेलखंड की प्रेरक कहानियाँ
🌿 केस 1: झाँसी जिले का बगरा गाँव
इस गाँव में वर्षों से तालाब सूखा पड़ा था। मनरेगा योजना के तहत खुदाई हुई।
- तालाब में बरसात का पानी भरने लगा।
- खेती साल भर होने लगी।
- युवाओं ने मछली पालन शुरू किया।
आज बगरा गाँव को लोग “मॉडल वाटर विलेज” कहकर बुलाते हैं।
🌿 केस 2: ललितपुर का छोटा तालाब, बड़ा बदलाव
यहाँ एक छोटा तालाब खुदा, लेकिन उसका असर बड़ा हुआ।
- पहले किसान सिर्फ बरसाती खेती करते थे।
- अब वे आलू और प्याज़ जैसी नकदी फसलें उगाने लगे हैं।
- गाँव की महिलाओं ने तालाब के किनारे सब्ज़ियाँ बोनी शुरू कीं और हाट–बाज़ार में बेचकर आमदनी बढ़ाई।
🌿 केस 3: चित्रकूट का पुनर्जीवित तालाब
चित्रकूट जिले के एक गाँव में तालाब पूरी तरह मिट्टी से भर गया था।
ग्राम पंचायत ने इसे फिर से खोदवाया।
अब यह तालाब न सिर्फ सिंचाई का सहारा है, बल्कि गाँव का त्योहार स्थल भी बन गया है।
हर सावन में यहाँ मेला लगता है।
भविष्य की पीढ़ियों के लिए जल–सुरक्षा
तालाब खुदाई और लघु सिंचाई योजनाएँ सिर्फ आज की ज़रूरत पूरी नहीं करतीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आधार तैयार करती हैं।
1. जल संरक्षण की परंपरा
बच्चे जब देखते हैं कि तालाब गाँव की जान है, तो वे भी इसे बचाने की ज़िम्मेदारी सीखते हैं।
2. स्थायी खेती
सिंचाई के साधन मिलने से किसान रसायनों पर निर्भर नहीं रहते और टिकाऊ खेती कर पाते हैं।
3. पर्यावरण संरक्षण
तालाब के आसपास पेड़-पौधे और हरियाली बढ़ती है। पक्षी और जीव-जंतु लौट आते हैं।
यह भविष्य के लिए पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने का काम करता है।
4. आत्मनिर्भर गाँव
जब गाँव खुद अपने पानी का प्रबंधन करता है, तो वह बाहरी मदद पर निर्भर नहीं रहता।
👉 यही असली आत्मनिर्भरता है।
आँकड़ों से ज़िंदगी तक – गणना की असली ताक़त
जब सरकार हर पाँच–सात साल में लघु सिंचाई गणना (Minor Irrigation Census) करती है, तो यह केवल तालाबों, कुओं और नलकूपों की गिनती भर नहीं होती।
👉 यह गिनती बताती है –
- कितनी ज़मीन पर खेती हो रही है।
- कितने तालाब और कुएँ चल रहे हैं, कितने बेकार हो गए।
- योजनाएँ ज़मीन पर कितना असर डाल रही हैं।
यानी यह गणना पानी की स्थिति का आईना है।
अगर आँकड़े सही हैं, तो नीतियाँ भी सही दिशा में बन सकती हैं।
बुंदेलखंड के लिए सबक
बुंदेलखंड बार–बार पानी की किल्लत झेलता रहा है।
यहाँ की सूखी धरती और टूटी हुई फसलें मानो चीख–चीख कर कहती हैं कि – “हमें तालाब चाहिए, हमें पानी चाहिए।”
इस क्षेत्र से हमें तीन बड़े सबक मिलते हैं:
1. स्थानीय समाधान ही टिकाऊ हैं
बड़े–बड़े बाँध या दूर से लाई गई नहरें हर जगह काम नहीं करतीं।
लेकिन छोटे तालाब, कुएँ और चेक डैम स्थानीय स्तर पर बड़ा असर डालते हैं।
2. समुदाय की भागीदारी ज़रूरी है
अगर तालाब सिर्फ सरकार बनाए और गाँव वाले उसे न सँभालें, तो वह जल्द ही बेकार हो जाएगा।
👉 असली बदलाव तभी होगा जब गाँव खुद अपने तालाब को अपना माने और उसकी देखरेख करे।
3. परंपरा और आधुनिकता का मेल
पुराने ज़माने में गाँव–गाँव में बावड़ी और तालाब होते थे।
आज आधुनिक मशीनों और तकनीक के साथ अगर इन्हें फिर से जीवित किया जाए, तो पानी की समस्या काफी हद तक खत्म हो सकती है।
जल प्रबंधन को स्थायी बनाने के उपाय
1. हर गाँव में कम से कम एक तालाब
गाँव के नक्शे में तालाब को जगह मिले, उसे पंचायत की प्राथमिकता में रखा जाए।
2. तालाब का नियमित रखरखाव
हर साल बरसात से पहले तालाब की सफाई और किनारों की मरम्मत ज़रूरी हो।
3. जल–साक्षरता
गाँव के बच्चों और युवाओं को यह सिखाना होगा कि पानी बचाना क्यों ज़रूरी है।
4. योजनाओं का बेहतर उपयोग
PMKSY, जलशक्ति अभियान और मनरेगा जैसी योजनाओं का तालाब निर्माण और जीर्णोद्धार में अधिकतम उपयोग किया जाए।
5. आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल
ड्रोन सर्वे, जीआईएस मैपिंग और डिजिटल मॉनिटरिंग से यह देखा जा सकता है कि कौन–सा तालाब कितना पानी रोक रहा है और कितने खेतों तक पहुँचा रहा है।
कहानी का अंतिम दृश्य
बरसात की पहली फुहारों में जब तालाब भरता है, तो गाँव का माहौल बदल जाता है।
- बच्चे उसमें खेलते हैं।
- महिलाएँ पानी भरती हैं।
- किसान खेतों में लहलहाती फसल देखते हैं।
रामलाल जैसे किसान मुस्कुराते हुए कहते हैं –
“अब हमें बारिश के भरोसे नहीं जीना, तालाब ने हमें जीना सीखा दिया है।”
यही असली संदेश है –
तालाब सिर्फ पानी नहीं, यह गाँव की आत्मा है।
निष्कर्ष
- 7वीं लघु सिंचाई गणना हमें यह समझने में मदद करती है कि देश और विशेषकर बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में पानी की असली स्थिति क्या है।
- तालाब खुदाई और जीर्णोद्धार किसानों के लिए जीवन रेखा हैं।
- आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय – हर दृष्टि से तालाब गाँव को मजबूत बनाते हैं।
- आने वाली पीढ़ियों की जल–सुरक्षा इन्हीं छोटे–छोटे प्रयासों पर टिकी है।
👉 अगर हम सब मिलकर तालाबों को फिर से जीवन देंगे, तो धरती भी मुस्कुराएगी और आने वाले कल की प्यास भी बुझेगी।