उथले नलकूप: ग्रामीण भारत की सिंचाई व्यवस्था का अहम आधार
✨ परिचय
भारत कृषि प्रधान देश है और यहाँ की अधिकांश आबादी कृषि पर निर्भर करती है। सिंचाई के साधनों में नलकूप (Tube Well) का विशेष महत्व है। नलकूप दो प्रकार के होते हैं – उथले नलकूप (Shallow Tube Well) और गहरे नलकूप (Deep Tube Well)। इन दोनों में से उथला नलकूप अपेक्षाकृत कम गहराई वाला और ग्रामीण इलाकों के लिए किफायती विकल्प माना जाता है।
उथले नलकूप का मुख्य उद्देश्य सतही जलभृत (Shallow Aquifer) से भूजल निकालना होता है। सामान्यतः इनकी गहराई 30 मीटर तक होती है। यह ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई का सस्ता और सरल साधन है।

🔎 उथले नलकूप की परिभाषा
उथला नलकूप वह कृत्रिम संरचना है, जिसमें एक बोरहोल जमीन में खोदा जाता है ताकि सतही जलभृत से भूजल निकाला जा सके।
- गहराई: सामान्यतः 10 से 30 मीटर तक
- प्रकार:
- गुहा ट्यूबवेल (Cavity Tube Well)
- छलनी ट्यूबवेल (Strainer Tube Well)
इनका निर्माण साधारण मशीनरी या हाथ से संचालित उपकरणों द्वारा किया जाता है।गुहा ट्यूबवेल (Cavity Tube Well)
📌 गुहा ट्यूबवेल (Cavity Tube Well)
गुहा ट्यूबवेल वह नलकूप है जिसमें जलभृत (Aquifer) की मिट्टी या रेतीली परत को बोरहोल के माध्यम से बाहर निकालकर नीचे एक खोखला स्थान (Cavity) बना दिया जाता है। यही खोखला स्थान जल संग्रहण और छनन (filtration) का कार्य करता है।

🛠️ निर्माण प्रक्रिया
- पहले बोरिंग कर 10–30 मीटर तक की गहराई तक पहुँचा जाता है।
- उसके बाद जलभृत वाली रेतीली परत में से कुछ मिट्टी या बालू को बाहर निकाल दिया जाता है।
- इस प्रक्रिया से नीचे एक गुहा (cavity) बन जाती है।
- इस cavity के अंदर से पानी रिसकर इकट्ठा होता है और पाइप के माध्यम से ऊपर उठाया जाता है।
⚙️ संचालन
- पानी सीधे गुहा में भरता है और वहाँ से मोटर पंप या हैंडपंप द्वारा खींचा जाता है।
✅ विशेषताएँ
- निर्माण सरल और सस्ता।
- इसमें कोई विशेष फिल्टर या छलनी की आवश्यकता नहीं।
- उथले क्षेत्रों और रेतीली मिट्टी वाले इलाकों के लिए उपयुक्त।
❌ सीमाएँ
- गाद जमने और मिट्टी भरने से गुहा जल्दी बंद हो सकती है।
- जीवनकाल अपेक्षाकृत कम (5–7 वर्ष)।
2️⃣ छलनी ट्यूबवेल (Strainer Tube Well)
📌 परिभाषा
छलनी ट्यूबवेल वह नलकूप है जिसमें पानी छानकर लाने के लिए छिद्रदार पाइप (Strainer Pipe) का उपयोग किया जाता है। ये पाइप विशेष प्रकार की छलनी (filter) से बने होते हैं जो मिट्टी को बाहर रोकते हैं और केवल पानी को अंदर आने देते हैं।

🛠️ निर्माण प्रक्रिया
- बोरिंग कर 10–30 मीटर की गहराई तक पहुँचा जाता है।
- जलभृत क्षेत्र में छिद्रदार पाइप (slotted pipe) डाला जाता है।
- पाइप के चारों ओर कंकड़ या बजरी का फिल्टर (Gravel Pack) भी भरा जाता है, ताकि रेत-पत्थर पाइप में न जा सकें।
- ऊपर का हिस्सा casing pipe से ढक दिया जाता है।
⚙️

संचालन
- पानी जलभृत से होकर छलनी पाइप के छिद्रों से छनकर ऊपर आता है।
- यह पानी स्वच्छ और गादरहित होता है।
✅ विशेषताएँ
- दीर्घायु (10–15 वर्ष तक कारगर)।
- पानी साफ और बिना गाद वाला मिलता है।
- जल प्रदूषण की संभावना कम।
❌ सीमाएँ
- निर्माण खर्च अपेक्षाकृत अधिक।
- तकनीकी जानकारी और सही सामग्री की आवश्यकता।
📊 तुलना (गुहा बनाम छलनी ट्यूबवेल)
| बिंदु | गुहा ट्यूबवेल (Cavity) | छलनी ट्यूबवेल (Strainer) |
|---|---|---|
| निर्माण लागत | कम | अधिक |
| जीवनकाल | 5–7 वर्ष | 10–15 वर्ष |
| पानी की गुणवत्ता | गादयुक्त हो सकता है | अपेक्षाकृत साफ |
| रखरखाव | बार-बार सफाई ज़रूरी | कम रखरखाव की ज़रूरत |
| उपयुक्त क्षेत्र | रेतीली मिट्टी वाले क्षेत्र | बजरी/कंकड़ वाली संरचनाएँ |
👉 सरल भाषा में कहें तो –
छलनी ट्यूबवेल महँगा है, लेकिन साफ और लंबे समय तक पानी देता है।
गुहा ट्यूबवेल सस्ता और जल्दी बनने वाला विकल्प है, लेकिन जल्दी भर सकता है।
🛠️ निर्माण प्रक्रिया
उथले नलकूप बनाने की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है:
1. स्थान का चयन

- ऐसी जगह चुनना आवश्यक है जहाँ जलभृत उथली गहराई पर मौजूद हो।
- सामान्यतः नदी, नाला, या जलस्रोतों के नज़दीकी इलाकों में इनकी सफलता दर अधिक होती है।
2. बोरिंग (Drilling)

- हाथ से बोरिंग सेट, पोर्टेबल पंप या छोटी ड्रिलिंग मशीन से 10–30 मीटर तक गड्ढा खोदा जाता है।
- मिट्टी की परतों के अनुसार पाइप डाला जाता है।
3. कॉयल स्ट्रेनर और फ्रेम का उपयोग
- लोहे के फ्रेम पर कॉयर स्ट्रिंग (नारियल रस्सी) बांधकर बनी संरचना का उपयोग स्ट्रेनर के रूप में किया जाता है।
- बांस के फ्रेम पर भी ट्यूब डाली जा सकती है।
4.

- कई बार स्टील पाइप की जगह बांस फ्रेम पर सबटु-समनाइज्ड बोररियों को लपेटकर पाइप बनाया जाता है।
- जल निकासी के लिए छलनी पाइप (Strainer Pipe) का उपयोग किया जाता है।
5. लाइसनिंग (Casing)
- बोरहोल को स्थिर रखने के लिए आमतौर पर निचले हिस्से में किसी प्रकार की लाइसनिंग नहीं होती।
- केवल ऊपरी हिस्से में ट्यूब डाली जाती है।
⚙️ संचालन (Operation)

- उथले नलकूप सामान्यतः सिंचाई के मौसम में प्रतिदिन 6–8 घंटे तक चलाए जाते हैं।
- इनसे औसतन 100–200 घन मीटर (cubic meter) पानी प्रतिदिन प्राप्त होता है।
- जल निकालने के लिए हैंडपंप, सबमर्सिबल पंप या साधारण मोटर पंप का उपयोग किया जाता है।
🌾 उपयोगिता
- कृषि सिंचाई – धान, गेहूँ, मक्का, गन्ना जैसी फसलों को सिंचाई हेतु पानी उपलब्ध कराना।
- पीने के पानी की आपूर्ति – ग्रामीण घरों में पीने योग्य पानी।
- पशुओं के लिए जल उपलब्धता।
- छोटे उद्यमों में पानी का उपयोग (जैसे ईंट भट्टा, छोटे कारखाने)।
✅ फायदे
- कम लागत – निर्माण में ज्यादा खर्च नहीं होता।
- स्थानीय सामग्री का उपयोग – बांस, कॉयर, पतली स्टील पाइप आदि।
- तेजी से निर्माण – 2–3 दिन में तैयार हो जाता है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में उपयुक्त।
- संचालन में सरल – किसी जटिल तकनीक की आवश्यकता नहीं।
❌ सीमाएँ / नुकसान
- सीमित गहराई – केवल सतही जलभृत तक सीमित।
- कम जल उत्पादन – बड़े पैमाने पर सिंचाई के लिए पर्याप्त नहीं।
- मौसमी प्रभाव – गर्मियों या सूखे में जल स्तर घट जाने से पानी मिलना बंद हो सकता है।
- जल प्रदूषण का खतरा – सतही प्रदूषण (खेतों की खाद, कीटनाशक, गंदा पानी) आसानी से प्रवेश कर सकता है।
- अल्पायु – अधिकतम 8–10 वर्ष तक कारगर, उसके बाद कार्यक्षमता घटने लगती है।
🌍 क्षेत्रीय महत्व
भारत के विभिन्न राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और पंजाब में उथले नलकूपों का उपयोग व्यापक है।
- गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में यह किसानों के लिए जीवनरेखा हैं।
- पूर्वी भारत के दलदली और नदी किनारे के क्षेत्र में ये अधिक प्रभावी पाए जाते हैं।
📊 आँकड़े (उदाहरण)
- एक औसत उथला नलकूप 100–200 घन मीटर पानी प्रतिदिन दे सकता है।
- एक हेक्टेयर भूमि की सिंचाई के लिए प्रतिदिन लगभग 60–80 घन मीटर पानी पर्याप्त है।
- इस प्रकार एक उथला नलकूप 1.5 से 2.5 हेक्टेयर तक भूमि की सिंचाई कर सकता है।
🌱 उथले नलकूप और किसानों की आजीविका
- छोटे और सीमांत किसान जिनके पास बड़े नलकूप या नहर सिंचाई का साधन नहीं है, वे उथले नलकूप से अपनी फसल को बचा पाते हैं।
- इससे ग्रामीण गरीबी कम करने और खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलती है।
🚧 चुनौतियाँ

- भूजल का गिरता स्तर – अधिक दोहन से जलभृत सूख सकते हैं।
- प्रदूषण – कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों का जल में मिलना।
- जलवायु परिवर्तन – वर्षा की कमी से सतही जलभृत recharge नहीं हो पाते।
- तकनीकी कमी – ग्रामीण इलाकों में सही तकनीक और रखरखाव का अभाव।
🏞️ समाधान और भविष्य की दिशा

- जल संरक्षण तकनीकें – वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को बढ़ावा देना।
- समूह आधारित नलकूप – कई किसान मिलकर सामुदायिक नलकूप का उपयोग करें।
- ऊर्जा-कुशल पंप – सौर ऊर्जा से चलने वाले पंपों का उपयोग।
- नियमित रखरखाव – पाइप और फिल्टर की समय-समय पर सफाई।
- विकल्पिक सिंचाई – ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणाली को अपनाना।
✍️ निष्कर्ष
उथले नलकूप भारत की ग्रामीण सिंचाई व्यवस्था का किफायती और सरल साधन हैं। ये छोटे और सीमांत किसानों के लिए जीवनदायिनी भूमिका निभाते हैं। हालाँकि, इनकी कुछ सीमाएँ हैं – जैसे सीमित जल उत्पादन, मौसमी प्रभाव और प्रदूषण का खतरा। यदि इनका उपयोग सतत तरीके से किया जाए और जल संरक्षण उपायों को साथ में अपनाया जाए तो यह ग्रामीण भारत की खाद्य सुरक्षा और कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
उथले नलकूप योजना वास्तव में कई राज्यों में लघु सिंचाई विभाग द्वारा “निःशुल्क बोरिंग योजना” (Free Boring Yojana) के नाम से चलाई जाती है।
🌟 निःशुल्क बोरिंग योजना (Free Boring Scheme)
उथले नलकूप केवल एक तकनीकी संरचना नहीं, बल्कि यह सरकारी सहयोग से जुड़ी योजना के रूप में भी किसानों तक पहुँचती है। इसे विभिन्न राज्यों में लघु सिंचाई विभाग (Minor Irrigation Department) द्वारा “निःशुल्क बोरिंग योजना” के नाम से संचालित किया जाता है।
| कृषक श्रेणी | बोरिंग पर अनुदान (रू० प्रति बोरिंग) | पम्पसेट पर अनुदान (रू० प्रति पम्पसेट) | जल वितरण प्रणाली पर अनुदान (एच.डी.पी.ई. पाइप) | कुल अधिकतम अनुमन्य अनुदान (रु० प्रति बोरिंग) | सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली पर अनुदान (रू० प्रति हेक्टेयर) |
|---|---|---|---|---|---|
| 1. सामान्य श्रेणी के लघु कृषक | 11,000/- | 18,000/- | 4,800/- | अधिकतम | 14,900/- |
| (01 हे. से अधिक 2 हे. तक) | |||||
| 2. सामान्य श्रेणी के सीमांत कृषक | 15,400/- | 25,200/- | 4,800/- | अधिकतम | 20,380/- |
| (01 हे. तक) | |||||
| 3. अनुसूचित जाति / जनजाति के कृषक | 19,800/- | 32,400/- | 4,800/- | अधिकतम | 25,860/- |
🏢 योजना का संचालन
- विभाग: लघु सिंचाई विभाग / अल्पसिंचित क्षेत्र विकास प्राधिकरण
- लागू क्षेत्र: ग्रामीण व कृषि प्रधान जिले
- उद्देश्य: छोटे और सीमांत किसानों को सिंचाई हेतु भूजल उपलब्ध कराना।
👩🌾 योजना के लाभार्थी
- छोटे किसान (2 हेक्टेयर तक भूमि वाले)
- सीमांत किसान (1 हेक्टेयर तक भूमि वाले)
- अनुसूचित जाति / जनजाति के कृषक
- भूमि धारक महिलाएँ व गरीब कृषक वर्ग
✨ योजना की खास बातें:
- संचालन विभाग – लघु सिंचाई विभाग / अल्पसिंचित क्षेत्र विकास प्राधिकरण।
- उद्देश्य – छोटे एवं सीमांत किसानों को सिंचाई के लिए जल उपलब्ध कराना।
- सुविधा – चयनित लाभार्थियों को सरकारी खर्च पर नलकूप की बोरिंग कर दी जाती है।
- लाभार्थी –
- छोटे एवं सीमांत किसान
- अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग
- भूमिहीन कृषक (कुछ राज्यों में)
- शर्तें –
- किसान के पास सिंचाई हेतु भूमि होनी चाहिए।
- भूजल उपलब्धता वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता।
- नलकूप की बोरिंग का पूरा खर्च सरकार वहन करती है।
- लाभ –
- किसान को बोरिंग के लिए पैसा खर्च नहीं करना पड़ता।
- ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा आसान।
- फसल उत्पादन और आय में वृद्धि।
👉 यानी कि उथला नलकूप केवल तकनीकी संरचना ही नहीं, बल्कि सरकारी योजना से जुड़ा हुआ hai
- बोरिंग की लागत सरकार वहन करती है – किसान को कोई शुल्क नहीं देना पड़ता।
- सिंचाई सुविधा बढ़ती है – खेतों को समय पर पानी उपलब्ध होता है।
- कृषि उत्पादन में वृद्धि – गेहूँ, धान, गन्ना और दलहन जैसी फसलों की पैदावार बढ़ती है।
- रोज़गार के अवसर – नलकूप की स्थापना से कृषि आधारित रोज़गार में वृद्धि।
📑 आवेदन प्रक्रिया (सामान्य रूप से)
- किसान को ग्राम पंचायत / ब्लॉक स्तर पर लघु सिंचाई विभाग के कार्यालय में आवेदन करना होता है।
- भूमि स्वामित्व और किसान वर्ग का प्रमाण प्रस्तुत करना आवश्यक है।
- प्राथमिकता उन किसानों को मिलती है जिनके पास सिंचाई का कोई अन्य साधन नहीं है।
📊 प्रभाव
- जिन इलाकों में यह योजना सफलतापूर्वक लागू हुई है, वहाँ छोटे और सीमांत किसानों की खेती लागत घटी है और आय में वृद्धि हुई है।
- यह योजना ग्रामीण भारत की सिंचाई क्रांति में अहम योगदान दे रही है।