Author name: Devendra Singh

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“एक बूँद की आस”(बुंदेलखंड के एक किसान की व्यथा)

बुंदेलखंड की तपती दोपहर थी। आसमान बादलों से खाली था, ज़मीन पर गर्म हवा तीर की तरह चल रही थी। खेत की मिट्टी की दरारें इतनी गहरी थीं मानो धरती खुद रो रही हो। सूखे पत्तों की खड़खड़ाहट के बीच एक वृद्ध किसान, Gangadhar, अपने बंजर खेत के किनारे बैठा था। दोनों हाथ सिर पर टिके थे, और नज़रें आसमान की ओर। आँखों में नमी थी, पर वह आँसू नहीं, सूखे की मार से उपजे असहायपन का बोझ था। “हे भगवान! कब बरसेगा ये पानी?” उसने आसमान की ओर देखते हुए धीरे से कहा। तीन साल से खेत ने अनाज नहीं उगला। नहरों में पानी नहीं, तालाब सूखे पड़े हैं, । रामस्वरूप की गाय भूख से मर गई, और उसके बेटे शहर में मज़दूरी करने चले गए। लेकिन रामस्वरूप? वह नहीं गया। “ये धरती मेरी माँ है,” वो अक्सर कहता। “माँ को छोड़ कैसे जाऊं?” पर अब, जब खेत की मिट्टी चटक चुकी थी, जब बीज बोने की भी हिम्मत नहीं बची थी, तब रामस्वरूप की उम्मीद बस एक चीज़ पर टिकी थी — आसमान की ओर। बादल कभी-कभी आते, ठिठकते, और बिना बरसे चले जाते। हर बार उसकी उम्मीद जागती, और फिर टूट जाती। एक दिन, गाँव के बच्चे उसके पास आकर बोले,“दद्दा, इस बार भी बारिश नहीं हुई तो क्या करेंगे?” Gangadhar चुप रहा। उसके पास जवाब नहीं था। फिर उसने धीरे से कहा, कि बुंदेलखंड की चट्टानी ज़मीन में पानी निकालना आसान नहीं है। इसलिए लघु सिंचाई विभाग के माध्यम से बिना किसी खर्च के यह कार्य कराया जा रहा है।” रामस्वरूप के दिल में बरसों बाद पहली बार एक उम्मीद जगी। अगले हफ्ते उसके खेत में सर्वे हुआ, और पंद्रह दिन के भीतर पत्थर काट कर एक गहरा कूप बनकर तैयार हुआ। बूँद-बूँद से हरियाली कूप से जैसे ही पानी निकला, रामस्वरूप की आँखों में आँसू आ गए — पर इस बार खुशी के थे।वह पानी अब खेत में गया, बीज बोए गए, और कुछ ही हफ्तों में उस बंजर ज़मीन पर हरी पत्तियाँ उग आईं। बच्चे खेलते हुए आए और बोले,“दद्दा, इस बार तो अच्छी फसल होगी!” Gangadhar ने उन्हें गले लगाते हुए कहा,“हाँ रे बिटवा, अब मेरे खेत में भी हरियाली लौटेगी… और ये सब उस कूप की वजह से है — जो सरकार ने मेरे लिए बनवाया।” निष्कर्ष: अब भी Gangadhar आसमान की ओर देखता है —पर अब डर के साथ नहीं, उम्मीद के साथ।क्योंकि अब उसे पता है कि अगर एक बूँद ऊपर से न भी गिरे, तो धरती के सीने में अब भी अमृत छुपा है,और सरकार का एक विभाग — लघु सिंचाई विभाग — उन किसानों की पीड़ा को समझता है और राहत पहुँचाता है। रामस्वरूप अब अकेला नहीं है, उसके साथ अब शासन की सोच, योजनाएँ और एक नवजीवन की शुरुआत है।

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“धरती के आँसू: जब भूजल भी थकने लगे”

धरती के आँसू: जब भूजल भी थकने लगे मैं सुझाव देता हूँ कि हम इसे 5 बड़े हिस्सों में बाँटें: भाग–1 : प्रस्तावना और भावनात्मक भूमिका क्या आपने कभी सूखी ज़मीन पर दरारें देखी हैं?वही धरती, जिसे हम “माँ” कहते हैं, जब प्यास से तड़पती है तो उसका दर्द उन दरारों में साफ़ दिखता है। यह दर्द केवल मिट्टी का नहीं होता, यह हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति और हमारे भविष्य का दर्द भी है। भूजल – यानी वह पानी, जो चुपचाप धरती की तहों में छुपा रहता है – हमारी असली जीवनरेखा है। नदियाँ सूख जाएँ, झीलें प्यास से तड़पने लगें, तब भी यही भूजल है जो हमें जीने की उम्मीद देता है। यही कारण है कि गाँव का कुआँ, शहर का बोरवेल, खेत का नलकूप – सभी इसी मौन खज़ाने पर टिके हुए हैं। लेकिन सोचिए, अगर यही खज़ाना खाली होने लगे तो?क्या होगा उस किसान का जो सुबह खेत में पानी डालने की उम्मीद में बोरवेल चलाता है, और केवल धूल व कीचड़ बाहर आता है?क्या होगा उस माँ का, जो बच्चे को पानी पिलाने के लिए पाँच किलोमीटर दूर तक घड़े उठाकर चलती है?क्या होगा उन शहरों का, जहाँ करोड़ों लोग भूजल पर निर्भर हैं और जिनकी प्यास हर साल बढ़ती जा रही है? यह अब कोई कल्पना नहीं रह गई। यह कड़वी हकीकत है।दिल्ली, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में भूजल का स्तर हर साल 1–2 मीटर नीचे जा रहा है। कई जगह बोरवेल 1000 फीट गहरे खोदने के बाद भी सूखे मिलते हैं। धरती की कोख खाली हो रही है।हम केवल ले रहे हैं, कभी लौटाया नहीं।हमारे लालच, हमारी लापरवाही और हमारी अनियंत्रित विकास की भूख ने इस चुपचाप बहने वाले जीवनदायी जल को रुला दिया है। आज वक्त है कि हम धरती के इस दर्द को समझें।क्योंकि अगर धरती की कोख सूख गई, तो हमारी आने वाली पीढ़ियाँ केवल इतिहास की किताबों में ही पढ़ पाएँगी कि कभी “कुएँ और बावड़ियाँ पानी से लबालब हुआ करती थीं।”भाग–2 : भूजल की परिभाषा, महत्व और भारत की स्थिति भूजल क्या है? भूजल वह जल है जो भूमि की सतह के नीचे, मिट्टी और चट्टानों की दरारों व परतों में संचित रहता है। जब वर्षा का पानी या नदियों-तालाबों का जल धीरे-धीरे मिट्टी से रिसकर नीचे चला जाता है, तो वह भूजल का हिस्सा बनता है। यह प्रक्रिया धीमी है लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही जल धीरे-धीरे धरती के गर्भ में एक “सुरक्षित जल–भंडार” तैयार करता है। यह भंडार किसी बैंक की तिजोरी की तरह है।जैसे हम ज़रूरत पड़ने पर बैंक से पैसे निकालते हैं, वैसे ही हम कुएँ, ट्यूबवेल और पंपों से भूजल निकालते हैं। फर्क यह है कि बैंक का पैसा हम वापस जमा कर सकते हैं, लेकिन भूजल का बैंक तभी भरेगा जब हम धरती को पानी लौटाएँगे। एक्विफर: धरती का जलभरा गर्भ (Aquifer) भूजल जिस जगह जमा होता है उसे “एक्विफर” कहा जाता है। यह भूगर्भीय परतें होती हैं जिनमें जल सुरक्षित रहता है। भारत में भूजल का महत्व भारत दुनिया का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता है। सोचिए, यह मात्रा किसी एक देश की नहीं बल्कि पूरी दुनिया की भूजल खपत का बड़ा हिस्सा है। भूजल और भारतीय संस्कृति भारत में जल को हमेशा “जीवन” माना गया है। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में हमने इन परंपराओं को भुला दिया। हमने सोचा कि मशीनें हमें पानी देती रहेंगी, और धरती की कोख असीमित है। यही हमारी सबसे बड़ी भूल थी। भाग–3 : संकट – डरावने संकेत और कारण गिरता भूजल स्तर: मौन लेकिन घातक संकट अगर आप किसी किसान या बोरवेल ड्रिल करने वाले मज़दूर से पूछेंगे तो वह बताएगा कि पिछले 20–30 सालों में भूजल कितना नीचे चला गया है। यह “जल संकट” सिर्फ़ भविष्य की आशंका नहीं है, यह आज की कड़वी सच्चाई है। भूजल प्रदूषण: ज़हर बनता पानी पानी की कमी जितनी खतरनाक है, उतनी ही खतरनाक उसकी बिगड़ती गुणवत्ता है। संकट की मानवीय तस्वीर कल्पना कीजिए— भाग–4 : समाधान – परंपरा और आधुनिकता के संगम से रास्ता समाधान की तलाश: जब धरती मुस्कुराए समस्या जितनी गहरी है, समाधान उतने ही व्यापक और बहुस्तरीय होने चाहिए। केवल सरकारें या वैज्ञानिक इस संकट को हल नहीं कर सकते; इसमें हम सबकी भूमिका है। (i) वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) हर साल भारत में अरबों लीटर वर्षा जल बहकर नालों, नदियों और समुद्र में चला जाता है। अगर इस पानी का मात्र 20% भी संचित हो जाए तो हमारे अधिकांश भूजल संकट खत्म हो सकते हैं। (ii) पारंपरिक जल संरचनाओं का पुनर्जीवन भारत में जल संरक्षण की परंपरा सदियों पुरानी रही है। 👉 अगर हर गाँव अपना एक तालाब फिर से जगा ले, तो हजारों ट्यूबवेलों पर दबाव घट सकता है। (iii) आधुनिक तकनीक का प्रयोग (iv) जन–जागरूकता और शिक्षा पानी बचाने की सबसे बड़ी ताक़त “जन–भागीदारी” है। (v) कानून और नीतियाँ (vi) व्यक्तिगत स्तर पर कदम 👉 अगर परंपरा की समझ और आधुनिक तकनीक का संगम हो, तो धरती की कोख फिर से भर सकती ह भाग–5 : निष्कर्ष – भविष्य की पीढ़ी के नाम संदेश धरती का दर्द समझो, जल का मूल्य पहचानो भूजल केवल पानी नहीं है, यह धरती की कोख से मिला एक मौन उपहार है। यह वह जीवनदायी शक्ति है जिसने हमारी सभ्यता को जन्म दिया, हमारी कृषि को सम्भाला और हमारे घर–परिवारों की प्यास बुझाई। लेकिन आज हमने अपने स्वार्थ और लापरवाही से इसे संकट में डाल दिया है। अगर अभी नहीं जागे तो… भविष्य की पीढ़ियाँ हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी। तो वे पूछेंगी:“हमारे पूर्वजों ने धरती को इतना खाली क्यों कर दिया?” लेकिन उम्मीद अभी बाकी है हर बूँद बचाने का प्रयास धरती की मुस्कान लौटा सकता है। तो यह सपना हकीकत बन सकता है— अंतिम संदेश भूजल बचाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, यह हर इंसान का नैतिक कर्तव्य है।धरती ने हमें जीवन दिया है, अब हमारी बारी है कि हम उसकी कोख को फिर से सींचें। “अगर हमने अब भी न सोचा, तो पछताना भी बेकार होगा।और अगर आज एक बूँद भी बचा ली, तो कल वही बूँद पीढ़ियों का जीवन बचाएगी।”

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भूमिगत जल (Ground water) क्या है?

वर्षा के समय जो जल पृथ्वी पर गिरता है, उसका एक बड़ा भाग नदियों, नालों और समुद्रों में बह जाता है। कुछ भाग वाष्पीकृत होकर वायुमंडल में लौट जाता है और शेष जल भूमि की सतह से नीचे रिसकर धरती के विभिन्न स्तरों में चला जाता है। यह जल धीरे-धीरे मिट्टी, बालू, चट्टानों और परतों से गुजरते हुए नीचे जमा होता है। इस जल को ही भूमिगत जल (Groundwater) कहा जाता है। और शेष जल भूमि की सतह से नीचे रिसकर धरती के विभिन्न स्तरों में चला जाता है। यह जल धीरे-धीरे मिट्टी, बालू, चट्टानों और परतों से गुजरते हुए नीचे जमा होता है। इस जल को ही भूमिगत जल (Groundwater) कहा जाता है। यह जल कुंओं, नलकूपों, हैंडपंपों और बोरवेल्स के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। भूमिगत जल का महत्वभूमिगत जल का उपयोग कृषि, पेयजल, उद्योग, निर्माण कार्य, घरेलू उपयोग और पशुपालन जैसी अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो लगभग संपूर्ण पेयजल की आवश्यकता भूमिगत जल से ही पूरी होती है। शहरी क्षेत्रों में भी, जहाँ जल आपूर्ति की व्यवस्था सुसंगठित नहीं है, वहाँ लोग नलकूपों या बोरवेल्स के माध्यम से जल प्राप्त करते हैं। भूमिगत जल के स्रोत भूमिगत जल का मुख्य स्रोत वर्षा जल ही होता है। वर्षा के समय जो जल भूमि की सतह से नीचे रिसता है, वह चट्टानों की दरारों और मिट्टी की परतों में जाकर जमा हो जाता है। यह जल परतों के बीच इकट्ठा होकर जलभंडार (Aquifer) बनाता है। इन्हीं जलभंडारों से नलकूप और बोरवेल्स जल खींचते हैं। इसके अलावा झीलें, तालाब और नदियाँ भी भूमिगत जल को पुनः पूर्ति करने में सहायक होती हैं। भूमिगत जल की सीमितता यद्यपि भूमिगत जल का भंडार विशाल प्रतीत होता है, परंतु यह वास्तव में सीमित और नवीकरणीय संसाधन है। जल का अत्यधिक दोहन, वर्षा की कमी, हरियाली की कटाई, जल संचयन के साधनों का अभाव और शहरीकरण के कारण भूमिगत जल का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। अनेक क्षेत्रों में स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि कुछ बोरवेल्स और नलकूप सूख चुके हैं और जल सैकड़ों फीट नीचे चला गया है। जल संकट के कारण जल संरक्षण के उपाय सरकारी प्रयास भारत सरकार एवं विभिन्न राज्य सरकारें भी भूमिगत जल के संरक्षण के लिए अनेक योजनाएँ चला रही हैं जैसे – ‘जल शक्ति अभियान’, ‘अटल भूजल योजना’, ‘नमामि गंगे’, Catch the rain, Mukhya mantri Laghu sichai Yojana आदि। इन योजनाओं का उद्देश्य जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देना है। निष्कर्ष जल जीवन है, और इसका संरक्षण हम सभी की जिम्मेदारी है। भूमिगत जल एक अनमोल संसाधन है, जो सीमित है और जिसके पुनर्भरण में वर्षों लग जाते हैं। यदि हम आज भी इसके महत्व को नहीं समझेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को गहरे जल संकट का सामना करना पड़ेगा। अतः जल का विवेकपूर्ण उपयोग करें, संरक्षण करें और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करें। 1. पेयजल हेतु: शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में यह मुख्य स्रोत है। जल चक्र में भूमिगत जल की भूमिका वर्षा के जल का एक भाग सीधे समुद्र, नदियों में चला जाता है, कुछ भाग वाष्पीकृत होकर वायुमंडल में लौटता है और शेष जल मिट्टी में रिसकर भूमिगत जल का हिस्सा बनता है। यह जल पुनः झरनों, कुओं व नदियों के माध्यम से सतह पर आकर जल चक्र को पूर्ण करता है। भूमिगत जल का महत्वभूमिगत जल का उपयोग कृषि, पेयजल, उद्योग, निर्माण कार्य, घरेलू उपयोग और पशुपालन जैसी अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो लगभग संपूर्ण पेयजल की आवश्यकता भूमिगत जल से ही पूरी होती है। शहरी क्षेत्रों में भी, जहाँ जल आपूर्ति की व्यवस्था सुसंगठित नहीं है, वहाँ लोग नलकूपों या बोरवेल्स के माध्यम से जल प्राप्त करते हैं। भूमिगत जल के स्रोत भूमिगत जल का मुख्य स्रोत वर्षा जल ही होता है। वर्षा के समय जो जल भूमि की सतह से नीचे रिसता है, वह चट्टानों की दरारों और मिट्टी की परतों में जाकर जमा हो जाता है। यह जल परतों के बीच इकट्ठा होकर जलभंडार (Aquifer) बनाता है। इन्हीं जलभंडारों से नलकूप और बोरवेल्स जल खींचते हैं। इसके अलावा झीलें, तालाब और नदियाँ भी भूमिगत जल को पुनः पूर्ति करने में सहायक होती हैं। भूमिगत जल की सीमितता यद्यपि भूमिगत जल का भंडार विशाल प्रतीत होता है, परंतु यह वास्तव में सीमित और नवीकरणीय संसाधन है। जल का अत्यधिक दोहन, वर्षा की कमी, हरियाली की कटाई, जल संचयन के साधनों का अभाव और शहरीकरण के कारण भूमिगत जल का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। अनेक क्षेत्रों में स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि कुछ बोरवेल्स और नलकूप सूख चुके हैं और जल सैकड़ों फीट नीचे चला गया है। जल संकट के कारण जल संरक्षण के उपाय सरकारी प्रयास भारत सरकार एवं विभिन्न राज्य सरकारें भी भूमिगत जल के संरक्षण के लिए अनेक योजनाएँ चला रही हैं जैसे – ‘जल शक्ति अभियान’, ‘अटल भूजल योजना’, ‘नमामि गंगे’, आदि। इन योजनाओं का उद्देश्य जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देना है।

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पानी का परिचय

जल ही जीवन का आधार है। यह कथन केवल कहने भर का नहीं, बल्कि शाश्वत सत्य है। जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। मनुष्य ही नहीं, बल्कि पृथ्वी पर मौजूद समस्त जीव-जंतु, वनस्पतियाँ, सूक्ष्म जीव, पशु-पक्षी, सभी के लिए जल अत्यावश्यक तत्व है। यह प्रकृति का एक अमूल्य उपहार है, जिसे नदियों, झीलों, तालाबों, नालों, झरनों, भूमिगत जल स्रोतों, और समुद्रों के रूप में पाया जाता है प्राचीन काल से ही मनुष्य जल का उपयोग विभिन्न कार्यों में करता आ रहा है – जैसे पीने के लिए, सिंचाई के लिए, घरेलू कामों में, उद्योगों में तथा बिजली उत्पादन में। भारत जैसे विशाल देश में जहाँ विविध भौगोलिक परिस्थितियाँ हैं, वहाँ जल की उपलब्धता किसी क्षेत्र विशेष की वर्षा और भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करती है। कुछ क्षेत्रों में पर्याप्त जल संसाधन हैं, तो कुछ क्षेत्र सूखे की चपेट में रहते हैं समस्या तब उत्पन्न होती है जब जल संसाधनों का अंधाधुंध व असंतुलित दोहन किया जाता है। जनसंख्या वृद्धि, तीव्र शहरीकरण, रहन-सहन में बदलाव, जल के प्रति लापरवाही, पुराने जल स्रोतों का संरक्षण न होना आदि कारणों से जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है। भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन होने के कारण जल स्तर निरंतर नीचे गिरता जा रहा है। जिससे खेतों की सिंचाई, पेयजल उपलब्धता, तथा औद्योगिक क्रियाओं में बाधाएँ उत्पन्न हो रही हैं। आज स्थिति यह है कि गाँवों से लेकर शहरों तक, जल संकट तेजी से गहराता जा रहा है। अधिकांश महानगरों में गर्मियों में पानी की भारी किल्लत देखी जाती है। जल की गुणवत्ता में भी गिरावट आई है। जल प्रदूषण की समस्या बहुत गंभीर होती जा रही है। घरेलू और औद्योगिक कचरे को नदियों में बहा देने से नदियाँ गंदे नालों में तब्दील हो गई हैं। इससे न केवल मनुष्य, बल्कि जलीय जीवों के जीवन पर भी संकट मंडरा रहा है। जल संकट का एक बड़ा कारण वर्षा जल का संग्रह न करना है। हर वर्ष मानसून के दौरान भारी मात्रा में पानी बहकर समुद्र में चला जाता है, जबकि यदि उसका संग्रह किया जाए, तो जल की कमी काफी हद तक दूर की जा सकती है। वर्षा जल संचयन (Rain Water Harvesting) एक प्रभावी उपाय है जिससे जल स्तर को पुनः ऊपर लाया जा सकता है। इसके अलावा पुराने जल स्रोतों जैसे बावड़ी, कुएँ, तालाब आदि का पुनरुद्धार करना भी आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक जल संग्रह प्रणाली को पुनर्जीवित कर वहां के जल संकट को कम किया जा सकता है। सरकार द्वारा कई जल संरक्षण योजनाएँ चलाई जा रही हैं जैसे लघु सिंचाई विभाग द्वारा मुख्य मंत्री लघु सिंचाई योजना– ‘जल शक्ति अभियान’, ‘अटल भूजल योजना’, ‘नमामि गंगे catch the rain ’ आदि। इनका उद्देश्य जल स्रोतों का संरक्षण, पुनर्भरण, व जनजागरूकता फैलाना है। लेकिन केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। आम जनता को भी जल संरक्षण के लिए अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। हमें अपने दैनिक जीवन में जल का विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए। नलों को खुला न छोड़ें, टपकते नलों की मरम्मत करें, बर्तन धोने व नहाने में जरूरत से ज्यादा पानी न बहाएँ, कार धोने में पाइप के बजाय बाल्टी का प्रयोग करें, वर्षा जल को संग्रह करें, पेड़ों को बचाएँ क्योंकि वृक्ष वर्षा लाने में सहायक होते हैं। वर्तमान समय में जल संरक्षण केवल विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुका है। यदि अब भी हम नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ जल के लिए तरसेंगी। जल संकट से निपटना केवल वैज्ञानिक या सरकारी विषय नहीं, बल्कि यह प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य हैनिष्कर्षतः, जल संरक्षण हमारे अस्तित्व की रक्षा से जुड़ा विषय है। यदि हमें धरती पर जीवन बनाए रखना है, तो जल के प्रति सचेत रहना ही होगा। वैज्ञानिक तकनीक, पारंपरिक ज्ञान, सरकार और जनता – सभी को मिलकर जल संकट से निपटना होगा। तभी हम एक सुरक्षित, समृद्ध और जल-सम्पन्न भविष्य की ओर बढ़ सकेंगे।

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