चट्टानों में भू-जल का भंडारण कैसे होता है? (Fractures, Joints एवं Weathered Zone की वैज्ञानिक व्याख्या)
Meta Description:जानिए विन्ध्य एवं बुन्देलखण्ड क्षेत्र की चट्टानों में भू-जल कहाँ संग्रहित रहता है। Fractures, Joints और Weathered Zone के माध्यम से भू-जल संचयन एवं ब्लास्ट कूप की कार्यप्रणाली को विस्तार से समझें। Hero Section शीर्षक क्या चट्टानों के नीचे कोई विशाल भूमिगत तालाब होता है? अधिकांश लोगों की धारणा है कि जमीन के नीचे किसी तालाब या झील की तरह पानी भरा रहता है और कुआँ या बोरवेल उसी जलाशय तक पहुँचकर पानी निकालते हैं। वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। भूगर्भ जल विज्ञान (Hydrogeology) के अनुसार विन्ध्य एवं बुन्देलखण्ड क्षेत्र की कठोर चट्टानों में पानी किसी बड़े भूमिगत तालाब के रूप में नहीं रहता, बल्कि चट्टानों में मौजूद प्राकृतिक दरारों (Fractures), जोड़ों (Joints), वेदरिंग जोन (Weathered Zone) तथा सूक्ष्म रिक्त स्थानों में संग्रहित रहता है। Featured Image चट्टानों की वास्तविक संरचना क्या होती है? जब हम किसी पहाड़ी या चट्टान को देखते हैं तो वह ठोस दिखाई देती है। लेकिन भूवैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि अधिकांश कठोर चट्टानों में समय के साथ अनेक प्राकृतिक दरारें विकसित हो जाती हैं। इन दरारों के निर्माण के मुख्य कारण हैं: यही दरारें भू-जल संचयन का मुख्य माध्यम बनती हैं Fractures (दरारें) क्या होती हैं? Fracture वह प्राकृतिक टूटन होती है जो चट्टानों के भीतर विकसित होती है। इन दरारों की चौड़ाई कुछ मिलीमीटर से लेकर कई सेंटीमीटर तक हो सकती है। जब वर्षा का पानी भूमि की सतह से नीचे प्रवेश करता है तो वह इन दरारों में भर जाता है। इंजीनियरिंग दृष्टि से देखा जाए तो Fractures प्राकृतिक पाइपलाइन की तरह कार्य करती हैं। इन्हीं मार्गों से पानी गहराई तक पहुँचता है। Fracture की विशेषताएँ ✔ जल संचयन क्षमता ✔ जल प्रवाह क्षमता ✔ Aquifer Recharge ✔ Blast Well Recharge Source Joints (जॉइंट्स) क्या होते हैं? Joints चट्टानों में विकसित होने वाले प्राकृतिक विभाजन होते हैं। ये Fractures की तुलना में अधिक व्यवस्थित होते हैं। जॉइंट्स आपस में जुड़कर एक नेटवर्क बनाते हैं। जब वर्षा होती है तो पानी इन जॉइंट्स के माध्यम से दूर-दूर तक फैल जाता है। यही कारण है कि किसी एक स्थान पर हुई वर्षा का प्रभाव कई किलोमीटर दूर स्थित कुओं में भी दिखाई देता है। Weathered Zone क्या है? Weathered Zone चट्टानों की ऊपरी अपक्षयित परत होती है। यह परत सामान्यतः: से मिलकर बनी होती है। इस परत में जल धारण क्षमता सबसे अधिक होती है। बारिश का पानी सबसे पहले इसी क्षेत्र में एकत्रित होता है। इसके बाद धीरे-धीरे नीचे स्थित Fractures और Joints में प्रवेश करता है। वर्षा जल भूमिगत कैसे पहुँचता है? चरण 1: Rainfall वर्षा भूमि पर गिरती है। चरण 2: Infiltration पानी मिट्टी में प्रवेश करता है। चरण 3: Percolation जल धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ता है। चरण 4: Fracture Recharge दरारों और जॉइंट्स में भर जाता है। चरण 5: Aquifer Storage भू-जल भंडार विकसित होता है। ब्लास्ट कूप इन जल संरचनाओं का उपयोग कैसे करता है? ब्लास्ट कूप का मूल उद्देश्य इन प्राकृतिक दरारों तक पहुँचना होता है। जब 6 मीटर व्यास और 12 मीटर गहराई तक ब्लास्ट कूप बनाया जाता है तो: यही कारण है कि ब्लास्ट कूप सामान्य बोरवेल की तुलना में अधिक प्रभावी सिद्ध होते हैं। Section 7 बुन्देलखण्ड और विन्ध्य क्षेत्र में इसका महत्व इन क्षेत्रों की चट्टानें: से निर्मित हैं। इनमें Primary Porosity बहुत कम होती है। अतः भू-जल मुख्यतः Secondary Porosity अर्थात Fractures एवं Joints में ही संग्रहित रहता है। इसी कारण ब्लास्ट कूप तकनीक यहाँ विशेष रूप से सफल मानी जाती है। Section 8 गर्मी में पानी क्यों कम हो जाता है? मार्च से जून तक: फलस्वरूप दरारों में संग्रहित जल धीरे-धीरे कम होने लगता है। Section 9 मानसून के बाद पुनः पानी कैसे भरता है? जुलाई से सितम्बर के बीच: फलस्वरूप ब्लास्ट कूप में पुनः पानी दिखाई देने लगता है। FAQ Section क्या जमीन के नीचे कोई बड़ा तालाब होता है? नहीं, अधिकांश Hard Rock क्षेत्रों में पानी Fractures, Joints एवं Weathered Zone में संग्रहित रहता है। ब्लास्ट कूप पानी कहाँ से लाता है? प्राकृतिक जलधारण दरारों और जॉइंट्स से। गर्मी में ब्लास्ट कूप क्यों सूख जाता है? Recharge बंद होने और अधिक जल दोहन के कारण। मानसून में पुनः पानी क्यों आ जाता है? वर्षा जल पुनः दरारों एवं Aquifer को Recharge कर देता है। निष्कर्ष विन्ध्य एवं बुन्देलखण्ड क्षेत्र की चट्टानों में भू-जल किसी भूमिगत झील या तालाब के रूप में नहीं रहता। यह मुख्यतः Fractures, Joints और Weathered Zone में संग्रहित रहता है। ब्लास्ट कूप तकनीक इन प्राकृतिक जल संरचनाओं तक पहुँचकर वर्षा जल को Recharge करती है और किसानों को दीर्घकालिक सिंचाई सुविधा प्रदान करती है। यही कारण है कि यह तकनीक जल संकट वाले पठारी क्षेत्रों के लिए एक प्रभावी एवं वैज्ञानिक समाधान मानी जाती है।






